दो साल के अज्ञातवास के बाद वापसी तथा नया चिट्ठा
अज्ञातवास से वापसी की घोषणा किये काफी दिन हो गये कुछ लिखना न हो सका। अपने पुराने फ्लैगशिप ब्लॉग ई-पण्डित पर तो तकनीकी लेखन होता ही था। इसके अलावा काफी समय से विचार था कि इधर-उधर की लिखने के लिये एक पर्सनल ब्लॉग बनाया जाय जिस पर हिट-फ्लॉप की चिन्ता के बिना लिखा जा सके। हमने बहुतों को झेला है अब हमको भी झेलिये
इस पर्सनल चिट्ठे का नाम बहुत समय से सोच रखा था – श्रीश उवाच। कुछ महीनों पहले जब चिट्ठे दोबारा पढ़ना शुरु किया तो क्या देखते हैं एक और श्रीश चिट्ठाजगत में पदार्पण कर चुके हैं – श्रीश पाठक। ये जानकर प्रसन्नता हुयी कि हमारे हमनाम भी यहाँ आ चुके हैं और अब हम अकेले श्रीश नहीं रहे। मजे की बात ये कि उनके चिट्ठे का नाम देखा तो – श्रीश उवाच। वाह, नाम के साथ-साथ कल्पना भी मिलती है। खैर हमें नामकरण संस्कार की प्रसव पीड़ा से दोबारा गुजरना पड़ा।
दो साल में बहुत कुछ बदल गया है। चिट्ठों की संख्या कई गुणा हो गयी है। पहले हम सारे चिट्ठे पढ़ते थे, अब ऐसा करना सम्भव नहीं रह गया है। इसलिये ऍग्रीगेटरों की बजाय फीड रीडर से चिट्ठे ज्यादा पढ़ने लगा हूँ। वैसे ऑफलाइन जिन्दगी बहुत सुकून भरी थी, रविरतलामी जी के ऑफलाइन जीवी होने का राज अब समझ आया। चिट्ठाकारी के पुराने दिन तथा पुराने दोस्त अक्सर याद आते थे, उनमें से कई लिखना अब छोड़ चुके हैं। अक्सर किसी बात पर दिमाग की घण्टी बजती थी – इस पर तो एक पोस्ट बनती है।
अब लिखेंगे तो टिप्पणी की चिन्ता भी होगी, कौन आया, किसने पढ़ा, किसने टिपियाया वगैरा-वगैरा। अब लिखेंगे तो पाठक और टिप्पणी तभी मिलेंगे जब स्वयं भी औरों को पढ़ेंगे, टिपियायेंगे। यानि वही चक्र शुरु।
पर फिर भी ये है कि चिट्ठाकारी का अब ऍडिक्शन टाइप नहीं रहा। एक समय यह ऍडिक्शन छोड़ना मेरे लिये मुश्किल हो गया था। मित्र अमित गुप्ता तब भी कहते थे कि ऍडिक्शन की तरह मत लो, ब्लॉगिंग को मेरी तरह सामान्य ढंग से लो पर मुझसे होता न था। अब कुछ तो इतने समय के ऑफलाइन जीवन के कारण ये छूट गया तथा कुछ चिट्ठों की संख्या इतनी ज्यादा हो गयी है कि सभी को पढ़ना अब सम्भव ही नहीं। खैर अच्छा हुआ, इस सब के चलते ऍडिक्शन खुद ही छूट गया।
अज्ञातवास के पहले तथा उसके दौरान बेरोजगारी (प्राइवेट स्कूल की नौकरी को बेरोजगारी में ही गिनेंगे) को खूब झेला, अब जब सरकारी नौकरी में आकर इस चिन्ता से जान छूटी तो चिट्ठाकारी की खुरापात फिर सिर उठाने लगी है। अभी लिखने की बात आयी तो सोचता हूँ कहाँ से शुरु करुँ, क्या लिखूँ समझ नहीं आता। चिट्ठाजगत के दार्शनिक ज्ञानदत्त जी के शब्दों में कहें तो ट्यूब खाली लग रही है। कोशिश करते हैं इसे रीचार्ज करने की।
तो नये चिट्ठे का पता है – http://hindi.shrish.in
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about 6 months ago
nice……………………………………………………….
about 6 months ago
हम्म, तो पर्सनल बकबक के लिए भी चिट्ठा चालू कर लिया, मुबारक हो!
भई हम तो तब भी कहते थे, अब भी कहते हैं, लत बुरी बला है, इसलिए लत न लगाना किसी चीज़ की। इसलिए अच्छा हुआ कि ऑफ़लाइन जीवन के सबैटिकल के दौरान तुम्हारी यह लत छूट गई, ध्यान रखना पुनः न लग जाए!
मियां, यह कोई बैट्री थोड़े ही है जो रीचार्ज होगी, यह तो भरी जाती है चुक जाने के बाद!
about 6 months ago
श्रीश – नई नौकरी की बहुत मुबारक। आपके चिट्ठों के जरिए आपके विचारों का इंतजार रहेगा। यमुनानगर में ही हो या वह भी बदल दिया – पंकज
about 6 months ago
हिन्दी चिट्टजगत में फिर से स्वागत है।
about 6 months ago
@suman,
धन्यवाद आपकी नाइस टिप्पणी के लिये।
@amit,
लगता तो है कि अब लत छूट गई है। बाकी रीचार्ज कह लीजिये या फिर आपके शब्दों में दोबारा भरना।
@पंकज नरुला,
धन्यवाद पंकज भैया, यमुनानगर में ही हूँ।
@उन्मुक्त,
धन्यवाद, उन्मुक्त जी।
about 6 months ago
स्वागतम् पंडित जी। नाम बढि़या है…. हमारे वर्चुअल नामों में कुछ तो सांझा रहेगा !!!
about 6 months ago
मुबारक हो पंडित जी !