जनगणना बनी मास्टरों की बवाले जान
सरकारी मास्टर स्विस आर्मी नाइफ की तरह होता है, सरकार हर काम में मास्टरों को ठोक देती है। मास्टर आजकल पढ़ाने के लिये कम तमाम सरकारी कामों के लिये ज्यादा उपयोग होते हैं। हालिया मामला जनगणना का है, जैसा कि सभी जानते हैं भारत की जनगणना २०११ का पहला चरण १ अप्रैल से १५ जून तक जारी है। पहले तो इस बार हमारे यहाँ ड्यूटियाँ ही उल्टी-सीधी लगाई गई। किसी की घर से मीलों दूर ड्यूटी, किसी की डबल-डबल ड्यूटियाँ। बेचारे अध्यापक ड्यूटियाँ सही करवाने के लिये रोज शासकीय कार्यालयों में चक्कर काटते रहे। घंटो इंतजार करके अधिकारियों से फरियाद करके जैसे-तैसे ड्यूटियाँ सही करवायी गयी। ना चाहते हुये भी हमारी भी पर्यवेक्षक में ड्यूटी आ ही गयी, बस तभी समझ गये कि इस बार जून की छुट्टियों का सत्यानाश हुआ समझो।
जनगणना के लिये हर नगर/गाँव को ब्लॉकों में बाँटा गया है। हर नगर/गाँव में एक पर्यवेक्षक (सुपरवाइज़र) तथा उसके नीचे ब्लॉकों की संख्या अनुसार प्रगणक (ऍनमरेटर) होते हैं। पर्यवेक्षक का कार्य प्रगणकों को ब्लॉक अनुसार क्षेत्र बाँटना, मार्गदर्शन, उनके कार्य की जाँच करना आदि तथा अन्त में उनसे सब कागजात लेकर एवं सार तैयार कर उसे चार्ज अफसर को जमा करवाना है। पर्यवेक्षक घर-घर जाकर पहले भवनों तथा मकानों पर संख्या अंकित करता है तत्पश्चात जनगणना सम्बंधी ब्यौरा एकत्रित करता है। पहली सिरदर्दी तो ऍरिया बाँटना ही होती है, सरपंच, पटवारी आदि से मदद लेकर अनजान गाँव आदि में ऍरिया समझने तथा बाँटने में ही कई दिन लग जाते हैं।
प्रगणकों का कार्य भी कम आफत भरा नहीं। आजकल गर्मी के मौसम में घर-घर जाकर आंकड़े एकत्रित करना बड़ा मुश्किल काम है। लोग-बाग घरों में सोये होते हैं या आराम कर रहे होते हैं। ऊपर से शिक्षा विभाग का आदेश है कि स्कूल टाइम में जनगणना कार्य नहीं करना है, छुट्टी के बाद ही करना है। अब यह तो बड़ा मुश्किल है, सुबह-सुबह तो यह काम हो भी जाता है दिन में बड़ा मुश्किल है, भयंकर गर्मी होती है। थोड़ी देर के लिये स्कूल से चले भी जाओ तो अधिकारियों के छापे की तलवार लटकी रहती है। इस बारे अध्यापक नेताओं की अधिकारियों से बात भी हुयी पर वो ऊपर से आदेश है कह कर टाल देते हैं। समस्या ये है कि सिर्फ शाम को कर के इस काम को निपटाना बड़ा कठिन है। हर प्रगणक के पास औसत १५० घर होते हैं, कई बार ये बहुत बढ़ भी जाते हैं जैसे मेरे क्षेत्र में प्रगणकों के पास औसत २५० तक पहुँच गये हैं। इधर इस काम के पीछे बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। पहले तो रिजल्ट देरी से आते हैं, दाखिले ही नहीं निपटते और कुछ दिनों में छुट्टियाँ पढ़ने वाली हैं, सिलेबस पूरा कर ना ही मुश्किल हो जायेगा।
हर घर का फॉर्म भरने में औसतन आधा-पौना घण्टा लगता है तथा ज्यादा सदस्यों वाले परिवार में और ज्यादा समय लग जाता है। इसके अलावा गाँव आदि में लोगों से जानकारी जुटाने में बहुत समय लगता है, कइयों कों अपनी जन्मतिथि, सदस्यों के माता-पिता का नाम आदि याद ही नहीं होता, मेरे साथी कुछ प्रगणकों के पास ऐसे मामले आये कि बंदे को माता-पिता का नाम ही मालूम नहीं था। इसके अलावा कई इलाके ऐसे हैं जहाँ बैठने तक को भी कुछ नहीं मिलता। कई इलाके ऐसे कि प्यास लगने पर भी पानी पीने का मन न हुआ।
इस बार की जनगणना में राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर हेतु भी आंकड़े एकत्रित किये जा रहे हैं जिनका उपयोग यूनीक आइडेंटिटी कार्ड बनाने हेतु किया जायेगा, इसलिये वो फॉर्म भरते वक्त भी बहुत ध्यान देना पड़ता है कि कोई गलती न हो। ऊपर से ये भी ध्यान रखना पड़ता है कि को घर या परिवार छूट न जाय। इसके अलावा शहरी क्षेत्र के लोग तो जनगणना का मकसद समझते हैं, गाँव के क्षेत्र में कई बार लोग-बाग पच्चीसों बातें पूछने लगते हैं जैसे अजी हमारा पीला राशन कार्ड बनना चाहिये था, सरपंच ने बनवाया नहीं। उन्हें समझाना पड़ता है कि जनगणना का काम किसलिये है। कभी-कभी अजीब टाइप के लोग भी मिल जाते हैं जो जानकारियाँ देने में आनाकानी करते हैं, वो सोचते हैं कि कहीं सरकार उनकी चीजों का पता लगाकर उन पर कोई टैक्स वगैरह तो लगाने नहीं जा रही। महिला प्रगणकों को अकेले घरों में जाने में और समस्या है खासकर पिछड़े टाइप इलाकों में। एक-दो बार कुछ प्रगणकों को शराबी भी टकर गये जिनसे वो बड़ी मुश्किल से निपटे।
कुल मिलाकर काम इतना ज्यादा है कि सारा दिन लगकर भी आसानी से नहीं निपटता, ऊपर से अधिकारी हड़काते रहते हैं कि जल्दी करो। भगवान जाने इस काम के लिये ये भयंकर गर्मी का मौसम ही क्यों चुना सरकार ने। तपती दोपहल में झोला उठाये घूमते मास्टर जी की ये हालत है कि कुछ लोगों ने हमें मीटर रीडर समझ लिया।
तो ये था रोना प्रगणकों का, पर्यवेक्षकों की समस्यायें अगली पोस्ट में लिखूँगा।






about 1 year ago
मास्टर ऐसा जीव है जिससे पढ़ाने के अलावा सभी काम लिए जाते हैं। शायद राग दरबारी में पढ़ा था कि देश की शिक्षा गली की ऐसी कुतिया हो गई जिसे हर कोई लतिया कर चला जाता है।