हामिद करजई का विश्वासघात और भारत की विदेश नीति में तुष्टिकरण
हाल ही में अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई ने कहा कि भारत-पाक या अमेरिका-पाक युद्ध की स्थिति में उनका देश पाकिस्तान का साथ देगा।
हामिद करजई की शिक्षा भारत में हुयी। उनके देश को भारत ने पुनर्निर्माण में पूरा सहयोग दिया जहाँ काम करते हुये कई भारतीयों की जान गयी और जिसे भारत ने अरबों डॉलर का आर्थिक सहयोग दिया। दूसरी तरफ पाकिस्तान अफगानिस्तान की बरबादी का जिम्मेदार है। तब भी करजई साहब का कहना है कि भारत-पाक जंग की स्थिति में वे पाक का साथ देंगे। जिस भारत ने हमेशा अफगानिस्तान का साथ दिया, बदले में उसे हमेशा वहाँ से निर्यातित आतंकवाद ही मिला, उसके अहसान की बजाय करजई साहब पाक के साथ मजहबी भाईबन्दी को ज्यादा महत्व देते हैं।
साथ ही जिस अमेरिका ने करजई के देश को तालिबान से मुक्त कराया (भले ही अपना बदला लेने के लिये) उसके साथ पाक की जंग होने पर भी वे पाक का साथ देंगे। इसका मतलब इस्लामिक देशों के लिये दोस्ती, अहसान जैसी चीज का कोई मतलब नहीं, बस वे अपने मजहबी भाइयों का ही साथ देंगे चाहे उस भाई ने उन्हें लतियाया हो।
रविन्द्रनाथ की काबुलीवाला के समय से भारत में अफगान पठानों की अच्छी छवि थी, हामिद करजई की भी दुनिया में अच्छी छवि थी। इस बयान से भारत और अमेरिका दोनों को झटका लगा होगा। अब अमेरिका तो अपने हित की सोचेगा ही पर भारत उसी मूर्खता पर टिका रहेगा।
वक्त आ गया है कि भारत को अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में मुस्लिम देशों के प्रति तुष्टिकरण की नीति छोड़कर अपने हित पर ध्यान देना चाहिये। उदाहरण के लिये फिलिस्तीन को बेमतलब समर्थन देना जबकि उसके समेत पूरा इस्लामी आतंकी नेटवर्क भारत के खिलाफ काम करता है। उसे समर्थन देने के कारण भारत इजराइल को नाराज करता है जबकि वह रक्षा मामलों में भारत का महत्वपूर्ण सहयोगी हो सकता है। लेकिन समस्या ये है कि भारत में ओसाजा जी जैसे लोगों के भक्त मौजूद हैं जिससे लगता नहीं कि भारत को कभी अक्ल आयेगी।






about 6 months ago
सबके अपने-अपने हित हैं !