ePandit
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हामिद करजई का विश्वासघात और भारत की विदेश नीति में तुष्टिकरण
Oct 23rd
हाल ही में अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई ने कहा कि भारत-पाक या अमेरिका-पाक युद्ध की स्थिति में उनका देश पाकिस्तान का साथ देगा।
हामिद करजई की शिक्षा भारत में हुयी। उनके देश को भारत ने पुनर्निर्माण में पूरा सहयोग दिया जहाँ काम करते हुये कई भारतीयों की जान गयी और जिसे भारत ने अरबों डॉलर का आर्थिक सहयोग दिया। दूसरी तरफ पाकिस्तान अफगानिस्तान की बरबादी का जिम्मेदार है। तब भी करजई साहब का कहना है कि भारत-पाक जंग की स्थिति में वे पाक का साथ देंगे। जिस भारत ने हमेशा अफगानिस्तान का साथ दिया, बदले में उसे हमेशा वहाँ से निर्यातित आतंकवाद ही मिला, उसके अहसान की बजाय करजई साहब पाक के साथ मजहबी भाईबन्दी को ज्यादा महत्व देते हैं।
साथ ही जिस अमेरिका ने करजई के देश को तालिबान से मुक्त कराया (भले ही अपना बदला लेने के लिये) उसके साथ पाक की जंग होने पर भी वे पाक का साथ देंगे। इसका मतलब इस्लामिक देशों के लिये दोस्ती, अहसान जैसी चीज का कोई मतलब नहीं, बस वे अपने मजहबी भाइयों का ही साथ देंगे चाहे उस भाई ने उन्हें लतियाया हो।
रविन्द्रनाथ की काबुलीवाला के समय से भारत में अफगान पठानों की अच्छी छवि थी, हामिद करजई की भी दुनिया में अच्छी छवि थी। इस बयान से भारत और अमेरिका दोनों को झटका लगा होगा। अब अमेरिका तो अपने हित की सोचेगा ही पर भारत उसी मूर्खता पर टिका रहेगा।
वक्त आ गया है कि भारत को अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में मुस्लिम देशों के प्रति तुष्टिकरण की नीति छोड़कर अपने हित पर ध्यान देना चाहिये। उदाहरण के लिये फिलिस्तीन को बेमतलब समर्थन देना जबकि उसके समेत पूरा इस्लामी आतंकी नेटवर्क भारत के खिलाफ काम करता है। उसे समर्थन देने के कारण भारत इजराइल को नाराज करता है जबकि वह रक्षा मामलों में भारत का महत्वपूर्ण सहयोगी हो सकता है। लेकिन समस्या ये है कि भारत में ओसाजा जी जैसे लोगों के भक्त मौजूद हैं जिससे लगता नहीं कि भारत को कभी अक्ल आयेगी।
यमुनानगर में रविवार को हुये चिट्ठाकार मिलन की रिपोर्ट
Jul 26th
यमुनानगर में रविवार २४ जुलाई को हिन्दी के इंटरनेटिया लिक्खाड़ों का जमावड़ा हुआ। कार्यक्रम शहर के लगभग मध्य में स्थित नेहरु पार्क में हुआ। यह अब तक का सबसे बड़ा चिट्ठाकार मिलन था।
यह दिन मेरे लिये विशेष आनन्ददायक था। किसी जमाने में यमुनानगर से अकेला चिट्ठाकार होने से मेरी दशा ऐसी थी मानो आखिरी डायनोसोर पृथ्वी पर अकेला रह गया हो। बता नहीं सकता जिस दिन मुझे यमुनानगर के दूसरे चिट्ठाकार प्रवीण चोपड़ा जी का पता चला था तथा जिस दिन मैं अन्य चिट्ठाकार दर्शन बवेजा जी से साक्षात मिला था, कितनी प्रसन्नता हुयी थी। आज मैं संतुष्ट हूँ कि मेरे जैसे कुछ और प्राणी भी यमुनानगर में हैं।
इसके लिये काफी दिनों से कार्यक्रम बन रहा था। पुराने चिट्ठाकार साथियों को तो पहले ही सूचित कर दिया था, इसके अतिरिक्त मैं यमुनानगर के कुछ और सम्भावित हिन्दी चिट्ठाकारों को बुलाने का इच्छुक था। इसके लिये कुछ दिन पहले मैंने ब्लॉगर तथा गूगल सर्च के द्वारा यमुनानगर से हिन्दी में लिखे गये कई चिट्ठे खोजे तथा ब्लॉगर लगने वाले कुछ लोगों को मेल किया। एक-दो तो काफी हद तक चिट्ठाकारी की दुनिया से परिचित थे जिनमें निरंजन मिश्र ‘अनाम’ जी का पता लगाने का बहुत प्रयास किया पर न लग सका। इसी तरह एक-दो सज्जनों का भी जवाब नहीं आया।
खैर शाम को लगभग ५:१५ बजे में नेहरु पार्क पहुँच गया, रविन्द्र पुँज जी पहले से मौजूद थे। कुछ देर हमने कुछ तकनीकी मुद्दों पर चर्चा करते हुये इन्तजार किया। लगभग ५:३५ पर विक्रान्त चौहान जी पहुँचे। विक्रान्त जी राजकीय वरिष्ठ विद्यालय, जगाधरी में कम्प्यूटर लैब में लैब टैक्नीशियन हैं, उनसे मैं इस साल के शुरु मे वहाँ हुये अध्यापक प्रशिक्षण सेमिनार के दौरान मिला था। तभी पता चला था कि वे भी थोड़ा बहुत ब्लॉग लिखते हैं लेकिन हिन्दी चिट्ठाजगत से अनजान थे। इसलिये मैंने उन्हें अन्य चिट्ठाकारों से मिलवाने की सोची। कुछ देर बाद उमेश प्रताप वत्स जी भी पधारे। बरसात की वजह से जमीन गीली होने तथा घास बड़ी होने की वजह से नीचे बैठना ठीक न था तो हम लोग बैठने के लिये उपयुक्त जगह ढूँढने लगे, एक जगह एक कमरे में कवि सम्मेलन चल रहा था, हमने खिसक लेने में भलाई समझी, कहीं पकड़ कर बैठा न लिया जाय। एक जगह बैठने के लिये था पर कुछ जोड़े हमें देखकर असहज महसूस करने लगे तो आगे जाकर एक न चलने वाले फव्वारे के पास बैठने की सोची गयी।
काफी देर हम लोग चर्चा करते रहे। उमेश जी और विक्रान्त जी की राष्ट्रवादी मुद्दों पर चर्चा चलती रही जबकि मैं और रविन्द्र जी हिन्दी औजारों सम्बन्धी चर्चा में मशगूल थे। सवा छह के करीब दर्शन बवेजा जी भी पहुँच गये। इसके बाद ब्लॉगिंग सम्बन्धी चर्चा भी आरम्भ हो गयी क्योंकि वर्तमान में दर्शन जी यमुनानगर के सबसे पक्के ब्लॉगर हैं जो कि ब्लॉगजगत की सब खबरें रखते हैं। कुछ समय बाद डॉ॰ प्रवीण चोपड़ा जी भी पहुँच गये, वे एक जगह सत्संग से होकर आ रहे थे इसलिये लेट आये। विक्रान्त जी से सबका परिचय करवाने के बाद दुनिया जहान के मुद्दों पर ब्लॉगरी चिन्तन आरम्भ हो गया, लग रहा था कि अगर यह चिन्तन कुछ और समय चलता रहे तो भारत की सारी समस्याओं का समाधान निकल ही आयेगा। चिट्ठाजगत में अच्छे ऍग्रीगेटरों की कमी, फेसबुक की तरफ चिट्ठाकारों का बढ़ता रुझान तथा गूगल+ आदि पर भी चर्चा हुयी। कुछेक फोटो भी रविन्द्र जी ने अपने कैमरे से लिये।

(बायें से सर्वश्री, उमेश प्रताप वत्स, प्रवीण चोपड़ा, रविन्द्र पुँज, दर्शन बवेजा, विक्रान्त चौहान)

(बायें से सर्वश्री, उमेश प्रताप वत्स, प्रवीण चोपड़ा, श्रीश बेंजवाल, दर्शन बवेजा, विक्रान्त चौहान)
अन्धेरा होने लगा था कि कुछ समय बाद प्रैस-छायाकार गुरप्रीत सिंह सोढी जी प्रकट हुये। मुझे लगा कि अन्धेरा हो गया है तो कहीं रात के रिपोर्टर तो नहीं आ गये पर ये दूसरे थे। सोढी जी रविन्द्र जी के उन कुछ पत्रकार मित्रों में से हैं जिन्हें उन्होंने ब्लॉगिंग में पकड़ लाने की कोशिश की थी और कुछ हद तक सफल भी हुये। अन्धेरा हो गया था पर सोढी जी के लेंस ने कुछ दृश्य कैद कर ही लिये।

(बायें से सर्वश्री, सोढी जी के मित्र, विक्रान्त चौहान, श्रीश बेंजवाल, गुरप्रीत सिंह सोढी, प्रवीण चोपड़ा, दर्शन बवेजा)
इधर मैं विक्रान्त जी को हिन्दी टाइपिंग के तरीकों के बारे में बताने लगा, वे अब तक ब्लॉगर के अन्तर्निर्मित ट्राँसलिट्रेशन टूल से लिखते थे। दर्शन जी ने जब मैंने पूछा कि वे इन्स्क्रिप्ट पर कब आ रहे हैं तो वे बोले कि अब मैं फोनेटिक भी कीबोर्ड पर देखे बिना काफी हद तक कर लेता हूँ। मैंने तुरन्त अपनी नेटबुक पर उन्हें इन्स्क्रिप्ट से अंधेरे में टाइप कर दिखाया और फिर कहा कि अब वे फोनेटिक से लिखकर दिखायें। उम्मीद के मुताबिक वे नहीं कर पाये और उन्होंने इन्स्क्रिप्ट सीखने की हामी भरी। इधर प्रवीण चोपड़ा जी ने भी इन्स्क्रिप्ट प्रयोक्ता होने से यह काम कर दिखाया।
कुछ चर्चायें इस बारे में भी चली कि कैसे यमुनानगर से अन्य सम्भावित लोगों को हिन्दी चिट्ठाजगत से जोड़ा जाय। इसी क्रम में मुझे गूगल सर्च से मिले यमुनागर के एक रोमनागरी ब्लॉगर अशोक अग्रवाल जी को यूनिनागरी की दुनिया में लाने का मैंने सुझाव दिया। दर्शन जी ने बताया कि वे उन्हें जानते हैं तो किसी दिन उनसे मिलकर इस बारे में प्रयास करने की बात हुयी। इसके अलावा स्कूल, कॉलेज आदि जगहों पर वर्कशॉप आयोजित कर सम्भावित ब्लॉगरों को तलाशने और उन्हें अपनी बिरादरी में लाने की साजिशें रची गयी। रात के ८ बज चुके थे। भविष्य में भी ऐसे मिलन कार्यक्रम आयोजित करने का संकल्प लिया गया तथा सबने चलने की तैयारी की।
यह यमुनानगर की पहली ब्लॉगर मीट तो न थी पर इससे पहले ऐसे योजनाबद्ध तरीके से पहले नहीं हुयी थी। आपस में अलग-अलग तो मिलते रहते थे पर इससे पहले सब लोग डीएवी गर्ल्स कॉलेज में प्रवासी साहित्य सम्मेलन के दौरान ही इकट्ठे हुये थे। कुल मिलाकर कार्यक्रम आनन्ददायक रहा।
सभी फोटो रविन्द्र जी के कैमरे से, बाकी के फोटो यमुनानगर हलचल पर यहाँ देखें।
जनगणना बनी मास्टरों की बवाले जान
May 28th
सरकारी मास्टर स्विस आर्मी नाइफ की तरह होता है, सरकार हर काम में मास्टरों को ठोक देती है। मास्टर आजकल पढ़ाने के लिये कम तमाम सरकारी कामों के लिये ज्यादा उपयोग होते हैं। हालिया मामला जनगणना का है, जैसा कि सभी जानते हैं भारत की जनगणना २०११ का पहला चरण १ अप्रैल से १५ जून तक जारी है। पहले तो इस बार हमारे यहाँ ड्यूटियाँ ही उल्टी-सीधी लगाई गई। किसी की घर से मीलों दूर ड्यूटी, किसी की डबल-डबल ड्यूटियाँ। बेचारे अध्यापक ड्यूटियाँ सही करवाने के लिये रोज शासकीय कार्यालयों में चक्कर काटते रहे। घंटो इंतजार करके अधिकारियों से फरियाद करके जैसे-तैसे ड्यूटियाँ सही करवायी गयी। ना चाहते हुये भी हमारी भी पर्यवेक्षक में ड्यूटी आ ही गयी, बस तभी समझ गये कि इस बार जून की छुट्टियों का सत्यानाश हुआ समझो।
जनगणना के लिये हर नगर/गाँव को ब्लॉकों में बाँटा गया है। हर नगर/गाँव में एक पर्यवेक्षक (सुपरवाइज़र) तथा उसके नीचे ब्लॉकों की संख्या अनुसार प्रगणक (ऍनमरेटर) होते हैं। पर्यवेक्षक का कार्य प्रगणकों को ब्लॉक अनुसार क्षेत्र बाँटना, मार्गदर्शन, उनके कार्य की जाँच करना आदि तथा अन्त में उनसे सब कागजात लेकर एवं सार तैयार कर उसे चार्ज अफसर को जमा करवाना है। पर्यवेक्षक घर-घर जाकर पहले भवनों तथा मकानों पर संख्या अंकित करता है तत्पश्चात जनगणना सम्बंधी ब्यौरा एकत्रित करता है। पहली सिरदर्दी तो ऍरिया बाँटना ही होती है, सरपंच, पटवारी आदि से मदद लेकर अनजान गाँव आदि में ऍरिया समझने तथा बाँटने में ही कई दिन लग जाते हैं।
प्रगणकों का कार्य भी कम आफत भरा नहीं। आजकल गर्मी के मौसम में घर-घर जाकर आंकड़े एकत्रित करना बड़ा मुश्किल काम है। लोग-बाग घरों में सोये होते हैं या आराम कर रहे होते हैं। ऊपर से शिक्षा विभाग का आदेश है कि स्कूल टाइम में जनगणना कार्य नहीं करना है, छुट्टी के बाद ही करना है। अब यह तो बड़ा मुश्किल है, सुबह-सुबह तो यह काम हो भी जाता है दिन में बड़ा मुश्किल है, भयंकर गर्मी होती है। थोड़ी देर के लिये स्कूल से चले भी जाओ तो अधिकारियों के छापे की तलवार लटकी रहती है। इस बारे अध्यापक नेताओं की अधिकारियों से बात भी हुयी पर वो ऊपर से आदेश है कह कर टाल देते हैं। समस्या ये है कि सिर्फ शाम को कर के इस काम को निपटाना बड़ा कठिन है। हर प्रगणक के पास औसत १५० घर होते हैं, कई बार ये बहुत बढ़ भी जाते हैं जैसे मेरे क्षेत्र में प्रगणकों के पास औसत २५० तक पहुँच गये हैं। इधर इस काम के पीछे बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। पहले तो रिजल्ट देरी से आते हैं, दाखिले ही नहीं निपटते और कुछ दिनों में छुट्टियाँ पढ़ने वाली हैं, सिलेबस पूरा कर ना ही मुश्किल हो जायेगा।
हर घर का फॉर्म भरने में औसतन आधा-पौना घण्टा लगता है तथा ज्यादा सदस्यों वाले परिवार में और ज्यादा समय लग जाता है। इसके अलावा गाँव आदि में लोगों से जानकारी जुटाने में बहुत समय लगता है, कइयों कों अपनी जन्मतिथि, सदस्यों के माता-पिता का नाम आदि याद ही नहीं होता, मेरे साथी कुछ प्रगणकों के पास ऐसे मामले आये कि बंदे को माता-पिता का नाम ही मालूम नहीं था। इसके अलावा कई इलाके ऐसे हैं जहाँ बैठने तक को भी कुछ नहीं मिलता। कई इलाके ऐसे कि प्यास लगने पर भी पानी पीने का मन न हुआ।
इस बार की जनगणना में राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर हेतु भी आंकड़े एकत्रित किये जा रहे हैं जिनका उपयोग यूनीक आइडेंटिटी कार्ड बनाने हेतु किया जायेगा, इसलिये वो फॉर्म भरते वक्त भी बहुत ध्यान देना पड़ता है कि कोई गलती न हो। ऊपर से ये भी ध्यान रखना पड़ता है कि को घर या परिवार छूट न जाय। इसके अलावा शहरी क्षेत्र के लोग तो जनगणना का मकसद समझते हैं, गाँव के क्षेत्र में कई बार लोग-बाग पच्चीसों बातें पूछने लगते हैं जैसे अजी हमारा पीला राशन कार्ड बनना चाहिये था, सरपंच ने बनवाया नहीं। उन्हें समझाना पड़ता है कि जनगणना का काम किसलिये है। कभी-कभी अजीब टाइप के लोग भी मिल जाते हैं जो जानकारियाँ देने में आनाकानी करते हैं, वो सोचते हैं कि कहीं सरकार उनकी चीजों का पता लगाकर उन पर कोई टैक्स वगैरह तो लगाने नहीं जा रही। महिला प्रगणकों को अकेले घरों में जाने में और समस्या है खासकर पिछड़े टाइप इलाकों में। एक-दो बार कुछ प्रगणकों को शराबी भी टकर गये जिनसे वो बड़ी मुश्किल से निपटे।
कुल मिलाकर काम इतना ज्यादा है कि सारा दिन लगकर भी आसानी से नहीं निपटता, ऊपर से अधिकारी हड़काते रहते हैं कि जल्दी करो। भगवान जाने इस काम के लिये ये भयंकर गर्मी का मौसम ही क्यों चुना सरकार ने। तपती दोपहल में झोला उठाये घूमते मास्टर जी की ये हालत है कि कुछ लोगों ने हमें मीटर रीडर समझ लिया।
तो ये था रोना प्रगणकों का, पर्यवेक्षकों की समस्यायें अगली पोस्ट में लिखूँगा।
चुटकला – नारी सशक्तिकरण
Mar 8th
काफी दिनों बाद कुछ पोस्टें पढ़ीं, मिथिलेश जी की पोस्ट और चिट्ठाचर्चा पर यह लेख पढ़ा। हमको पूरा मामला पता नहीं, इसलिये अपनी प्रतिक्रिया नहीं देंगे पर लगे हाथ एक चुटकला याद आ गया, ठेल देते हैं। बाकी नारी सशक्तिकरण पर अपने विचार फिर कभी रखेंगे।
नोट: चुटकले को मात्र चुटकले के रुप में लें।
एक बार नारी सशक्तिकरण पर एक समारोह में एक वक्ता अपनी बात कह रहे थे – अबला जीवन तेरी यही कहानी… एक महिला श्रोता ने अपनी आपत्ति जताई – आज की नारी अबला नहीं रही, उसे अबला मत कहिये। वक्ता ने संशोधन किया – ठीक है जी आगे से अबला नहीं कहेंगे बला कहेंगे।
दो साल के अज्ञातवास के बाद वापसी तथा नया चिट्ठा
Mar 7th
अज्ञातवास से वापसी की घोषणा किये काफी दिन हो गये कुछ लिखना न हो सका। अपने पुराने फ्लैगशिप ब्लॉग ई-पण्डित पर तो तकनीकी लेखन होता ही था। इसके अलावा काफी समय से विचार था कि इधर-उधर की लिखने के लिये एक पर्सनल ब्लॉग बनाया जाय जिस पर हिट-फ्लॉप की चिन्ता के बिना लिखा जा सके। हमने बहुतों को झेला है अब हमको भी झेलिये
इस पर्सनल चिट्ठे का नाम बहुत समय से सोच रखा था – श्रीश उवाच। कुछ महीनों पहले जब चिट्ठे दोबारा पढ़ना शुरु किया तो क्या देखते हैं एक और श्रीश चिट्ठाजगत में पदार्पण कर चुके हैं – श्रीश पाठक। ये जानकर प्रसन्नता हुयी कि हमारे हमनाम भी यहाँ आ चुके हैं और अब हम अकेले श्रीश नहीं रहे। मजे की बात ये कि उनके चिट्ठे का नाम देखा तो – श्रीश उवाच। वाह, नाम के साथ-साथ कल्पना भी मिलती है। खैर हमें नामकरण संस्कार की प्रसव पीड़ा से दोबारा गुजरना पड़ा।
दो साल में बहुत कुछ बदल गया है। चिट्ठों की संख्या कई गुणा हो गयी है। पहले हम सारे चिट्ठे पढ़ते थे, अब ऐसा करना सम्भव नहीं रह गया है। इसलिये ऍग्रीगेटरों की बजाय फीड रीडर से चिट्ठे ज्यादा पढ़ने लगा हूँ। वैसे ऑफलाइन जिन्दगी बहुत सुकून भरी थी, रविरतलामी जी के ऑफलाइन जीवी होने का राज अब समझ आया। चिट्ठाकारी के पुराने दिन तथा पुराने दोस्त अक्सर याद आते थे, उनमें से कई लिखना अब छोड़ चुके हैं। अक्सर किसी बात पर दिमाग की घण्टी बजती थी – इस पर तो एक पोस्ट बनती है।
अब लिखेंगे तो टिप्पणी की चिन्ता भी होगी, कौन आया, किसने पढ़ा, किसने टिपियाया वगैरा-वगैरा। अब लिखेंगे तो पाठक और टिप्पणी तभी मिलेंगे जब स्वयं भी औरों को पढ़ेंगे, टिपियायेंगे। यानि वही चक्र शुरु।
पर फिर भी ये है कि चिट्ठाकारी का अब ऍडिक्शन टाइप नहीं रहा। एक समय यह ऍडिक्शन छोड़ना मेरे लिये मुश्किल हो गया था। मित्र अमित गुप्ता तब भी कहते थे कि ऍडिक्शन की तरह मत लो, ब्लॉगिंग को मेरी तरह सामान्य ढंग से लो पर मुझसे होता न था। अब कुछ तो इतने समय के ऑफलाइन जीवन के कारण ये छूट गया तथा कुछ चिट्ठों की संख्या इतनी ज्यादा हो गयी है कि सभी को पढ़ना अब सम्भव ही नहीं। खैर अच्छा हुआ, इस सब के चलते ऍडिक्शन खुद ही छूट गया।
अज्ञातवास के पहले तथा उसके दौरान बेरोजगारी (प्राइवेट स्कूल की नौकरी को बेरोजगारी में ही गिनेंगे) को खूब झेला, अब जब सरकारी नौकरी में आकर इस चिन्ता से जान छूटी तो चिट्ठाकारी की खुरापात फिर सिर उठाने लगी है। अभी लिखने की बात आयी तो सोचता हूँ कहाँ से शुरु करुँ, क्या लिखूँ समझ नहीं आता। चिट्ठाजगत के दार्शनिक ज्ञानदत्त जी के शब्दों में कहें तो ट्यूब खाली लग रही है। कोशिश करते हैं इसे रीचार्ज करने की।
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