चिट्ठाकारी
यमुनानगर में रविवार को हुये चिट्ठाकार मिलन की रिपोर्ट
Jul 26th
यमुनानगर में रविवार २४ जुलाई को हिन्दी के इंटरनेटिया लिक्खाड़ों का जमावड़ा हुआ। कार्यक्रम शहर के लगभग मध्य में स्थित नेहरु पार्क में हुआ। यह अब तक का सबसे बड़ा चिट्ठाकार मिलन था।
यह दिन मेरे लिये विशेष आनन्ददायक था। किसी जमाने में यमुनानगर से अकेला चिट्ठाकार होने से मेरी दशा ऐसी थी मानो आखिरी डायनोसोर पृथ्वी पर अकेला रह गया हो। बता नहीं सकता जिस दिन मुझे यमुनानगर के दूसरे चिट्ठाकार प्रवीण चोपड़ा जी का पता चला था तथा जिस दिन मैं अन्य चिट्ठाकार दर्शन बवेजा जी से साक्षात मिला था, कितनी प्रसन्नता हुयी थी। आज मैं संतुष्ट हूँ कि मेरे जैसे कुछ और प्राणी भी यमुनानगर में हैं।
इसके लिये काफी दिनों से कार्यक्रम बन रहा था। पुराने चिट्ठाकार साथियों को तो पहले ही सूचित कर दिया था, इसके अतिरिक्त मैं यमुनानगर के कुछ और सम्भावित हिन्दी चिट्ठाकारों को बुलाने का इच्छुक था। इसके लिये कुछ दिन पहले मैंने ब्लॉगर तथा गूगल सर्च के द्वारा यमुनानगर से हिन्दी में लिखे गये कई चिट्ठे खोजे तथा ब्लॉगर लगने वाले कुछ लोगों को मेल किया। एक-दो तो काफी हद तक चिट्ठाकारी की दुनिया से परिचित थे जिनमें निरंजन मिश्र ‘अनाम’ जी का पता लगाने का बहुत प्रयास किया पर न लग सका। इसी तरह एक-दो सज्जनों का भी जवाब नहीं आया।
खैर शाम को लगभग ५:१५ बजे में नेहरु पार्क पहुँच गया, रविन्द्र पुँज जी पहले से मौजूद थे। कुछ देर हमने कुछ तकनीकी मुद्दों पर चर्चा करते हुये इन्तजार किया। लगभग ५:३५ पर विक्रान्त चौहान जी पहुँचे। विक्रान्त जी राजकीय वरिष्ठ विद्यालय, जगाधरी में कम्प्यूटर लैब में लैब टैक्नीशियन हैं, उनसे मैं इस साल के शुरु मे वहाँ हुये अध्यापक प्रशिक्षण सेमिनार के दौरान मिला था। तभी पता चला था कि वे भी थोड़ा बहुत ब्लॉग लिखते हैं लेकिन हिन्दी चिट्ठाजगत से अनजान थे। इसलिये मैंने उन्हें अन्य चिट्ठाकारों से मिलवाने की सोची। कुछ देर बाद उमेश प्रताप वत्स जी भी पधारे। बरसात की वजह से जमीन गीली होने तथा घास बड़ी होने की वजह से नीचे बैठना ठीक न था तो हम लोग बैठने के लिये उपयुक्त जगह ढूँढने लगे, एक जगह एक कमरे में कवि सम्मेलन चल रहा था, हमने खिसक लेने में भलाई समझी, कहीं पकड़ कर बैठा न लिया जाय। एक जगह बैठने के लिये था पर कुछ जोड़े हमें देखकर असहज महसूस करने लगे तो आगे जाकर एक न चलने वाले फव्वारे के पास बैठने की सोची गयी।
काफी देर हम लोग चर्चा करते रहे। उमेश जी और विक्रान्त जी की राष्ट्रवादी मुद्दों पर चर्चा चलती रही जबकि मैं और रविन्द्र जी हिन्दी औजारों सम्बन्धी चर्चा में मशगूल थे। सवा छह के करीब दर्शन बवेजा जी भी पहुँच गये। इसके बाद ब्लॉगिंग सम्बन्धी चर्चा भी आरम्भ हो गयी क्योंकि वर्तमान में दर्शन जी यमुनानगर के सबसे पक्के ब्लॉगर हैं जो कि ब्लॉगजगत की सब खबरें रखते हैं। कुछ समय बाद डॉ॰ प्रवीण चोपड़ा जी भी पहुँच गये, वे एक जगह सत्संग से होकर आ रहे थे इसलिये लेट आये। विक्रान्त जी से सबका परिचय करवाने के बाद दुनिया जहान के मुद्दों पर ब्लॉगरी चिन्तन आरम्भ हो गया, लग रहा था कि अगर यह चिन्तन कुछ और समय चलता रहे तो भारत की सारी समस्याओं का समाधान निकल ही आयेगा। चिट्ठाजगत में अच्छे ऍग्रीगेटरों की कमी, फेसबुक की तरफ चिट्ठाकारों का बढ़ता रुझान तथा गूगल+ आदि पर भी चर्चा हुयी। कुछेक फोटो भी रविन्द्र जी ने अपने कैमरे से लिये।

(बायें से सर्वश्री, उमेश प्रताप वत्स, प्रवीण चोपड़ा, रविन्द्र पुँज, दर्शन बवेजा, विक्रान्त चौहान)

(बायें से सर्वश्री, उमेश प्रताप वत्स, प्रवीण चोपड़ा, श्रीश बेंजवाल, दर्शन बवेजा, विक्रान्त चौहान)
अन्धेरा होने लगा था कि कुछ समय बाद प्रैस-छायाकार गुरप्रीत सिंह सोढी जी प्रकट हुये। मुझे लगा कि अन्धेरा हो गया है तो कहीं रात के रिपोर्टर तो नहीं आ गये पर ये दूसरे थे। सोढी जी रविन्द्र जी के उन कुछ पत्रकार मित्रों में से हैं जिन्हें उन्होंने ब्लॉगिंग में पकड़ लाने की कोशिश की थी और कुछ हद तक सफल भी हुये। अन्धेरा हो गया था पर सोढी जी के लेंस ने कुछ दृश्य कैद कर ही लिये।

(बायें से सर्वश्री, सोढी जी के मित्र, विक्रान्त चौहान, श्रीश बेंजवाल, गुरप्रीत सिंह सोढी, प्रवीण चोपड़ा, दर्शन बवेजा)
इधर मैं विक्रान्त जी को हिन्दी टाइपिंग के तरीकों के बारे में बताने लगा, वे अब तक ब्लॉगर के अन्तर्निर्मित ट्राँसलिट्रेशन टूल से लिखते थे। दर्शन जी ने जब मैंने पूछा कि वे इन्स्क्रिप्ट पर कब आ रहे हैं तो वे बोले कि अब मैं फोनेटिक भी कीबोर्ड पर देखे बिना काफी हद तक कर लेता हूँ। मैंने तुरन्त अपनी नेटबुक पर उन्हें इन्स्क्रिप्ट से अंधेरे में टाइप कर दिखाया और फिर कहा कि अब वे फोनेटिक से लिखकर दिखायें। उम्मीद के मुताबिक वे नहीं कर पाये और उन्होंने इन्स्क्रिप्ट सीखने की हामी भरी। इधर प्रवीण चोपड़ा जी ने भी इन्स्क्रिप्ट प्रयोक्ता होने से यह काम कर दिखाया।
कुछ चर्चायें इस बारे में भी चली कि कैसे यमुनानगर से अन्य सम्भावित लोगों को हिन्दी चिट्ठाजगत से जोड़ा जाय। इसी क्रम में मुझे गूगल सर्च से मिले यमुनागर के एक रोमनागरी ब्लॉगर अशोक अग्रवाल जी को यूनिनागरी की दुनिया में लाने का मैंने सुझाव दिया। दर्शन जी ने बताया कि वे उन्हें जानते हैं तो किसी दिन उनसे मिलकर इस बारे में प्रयास करने की बात हुयी। इसके अलावा स्कूल, कॉलेज आदि जगहों पर वर्कशॉप आयोजित कर सम्भावित ब्लॉगरों को तलाशने और उन्हें अपनी बिरादरी में लाने की साजिशें रची गयी। रात के ८ बज चुके थे। भविष्य में भी ऐसे मिलन कार्यक्रम आयोजित करने का संकल्प लिया गया तथा सबने चलने की तैयारी की।
यह यमुनानगर की पहली ब्लॉगर मीट तो न थी पर इससे पहले ऐसे योजनाबद्ध तरीके से पहले नहीं हुयी थी। आपस में अलग-अलग तो मिलते रहते थे पर इससे पहले सब लोग डीएवी गर्ल्स कॉलेज में प्रवासी साहित्य सम्मेलन के दौरान ही इकट्ठे हुये थे। कुल मिलाकर कार्यक्रम आनन्ददायक रहा।
सभी फोटो रविन्द्र जी के कैमरे से, बाकी के फोटो यमुनानगर हलचल पर यहाँ देखें।
दो साल के अज्ञातवास के बाद वापसी तथा नया चिट्ठा
Mar 7th
अज्ञातवास से वापसी की घोषणा किये काफी दिन हो गये कुछ लिखना न हो सका। अपने पुराने फ्लैगशिप ब्लॉग ई-पण्डित पर तो तकनीकी लेखन होता ही था। इसके अलावा काफी समय से विचार था कि इधर-उधर की लिखने के लिये एक पर्सनल ब्लॉग बनाया जाय जिस पर हिट-फ्लॉप की चिन्ता के बिना लिखा जा सके। हमने बहुतों को झेला है अब हमको भी झेलिये
इस पर्सनल चिट्ठे का नाम बहुत समय से सोच रखा था – श्रीश उवाच। कुछ महीनों पहले जब चिट्ठे दोबारा पढ़ना शुरु किया तो क्या देखते हैं एक और श्रीश चिट्ठाजगत में पदार्पण कर चुके हैं – श्रीश पाठक। ये जानकर प्रसन्नता हुयी कि हमारे हमनाम भी यहाँ आ चुके हैं और अब हम अकेले श्रीश नहीं रहे। मजे की बात ये कि उनके चिट्ठे का नाम देखा तो – श्रीश उवाच। वाह, नाम के साथ-साथ कल्पना भी मिलती है। खैर हमें नामकरण संस्कार की प्रसव पीड़ा से दोबारा गुजरना पड़ा।
दो साल में बहुत कुछ बदल गया है। चिट्ठों की संख्या कई गुणा हो गयी है। पहले हम सारे चिट्ठे पढ़ते थे, अब ऐसा करना सम्भव नहीं रह गया है। इसलिये ऍग्रीगेटरों की बजाय फीड रीडर से चिट्ठे ज्यादा पढ़ने लगा हूँ। वैसे ऑफलाइन जिन्दगी बहुत सुकून भरी थी, रविरतलामी जी के ऑफलाइन जीवी होने का राज अब समझ आया। चिट्ठाकारी के पुराने दिन तथा पुराने दोस्त अक्सर याद आते थे, उनमें से कई लिखना अब छोड़ चुके हैं। अक्सर किसी बात पर दिमाग की घण्टी बजती थी – इस पर तो एक पोस्ट बनती है।
अब लिखेंगे तो टिप्पणी की चिन्ता भी होगी, कौन आया, किसने पढ़ा, किसने टिपियाया वगैरा-वगैरा। अब लिखेंगे तो पाठक और टिप्पणी तभी मिलेंगे जब स्वयं भी औरों को पढ़ेंगे, टिपियायेंगे। यानि वही चक्र शुरु।
पर फिर भी ये है कि चिट्ठाकारी का अब ऍडिक्शन टाइप नहीं रहा। एक समय यह ऍडिक्शन छोड़ना मेरे लिये मुश्किल हो गया था। मित्र अमित गुप्ता तब भी कहते थे कि ऍडिक्शन की तरह मत लो, ब्लॉगिंग को मेरी तरह सामान्य ढंग से लो पर मुझसे होता न था। अब कुछ तो इतने समय के ऑफलाइन जीवन के कारण ये छूट गया तथा कुछ चिट्ठों की संख्या इतनी ज्यादा हो गयी है कि सभी को पढ़ना अब सम्भव ही नहीं। खैर अच्छा हुआ, इस सब के चलते ऍडिक्शन खुद ही छूट गया।
अज्ञातवास के पहले तथा उसके दौरान बेरोजगारी (प्राइवेट स्कूल की नौकरी को बेरोजगारी में ही गिनेंगे) को खूब झेला, अब जब सरकारी नौकरी में आकर इस चिन्ता से जान छूटी तो चिट्ठाकारी की खुरापात फिर सिर उठाने लगी है। अभी लिखने की बात आयी तो सोचता हूँ कहाँ से शुरु करुँ, क्या लिखूँ समझ नहीं आता। चिट्ठाजगत के दार्शनिक ज्ञानदत्त जी के शब्दों में कहें तो ट्यूब खाली लग रही है। कोशिश करते हैं इसे रीचार्ज करने की।
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