काफी दिनों बाद कुछ पोस्टें पढ़ीं, मिथिलेश जी की पोस्ट और चिट्ठाचर्चा पर यह लेख पढ़ा। हमको पूरा मामला पता नहीं, इसलिये अपनी प्रतिक्रिया नहीं देंगे पर लगे हाथ एक चुटकला याद आ गया, ठेल देते हैं। बाकी नारी सशक्तिकरण पर अपने विचार फिर कभी रखेंगे।

नोट: चुटकले को मात्र चुटकले के रुप में लें।

एक बार नारी सशक्तिकरण पर एक समारोह में एक वक्ता अपनी बात कह रहे थे – अबला जीवन  तेरी यही कहानी… एक महिला श्रोता ने अपनी आपत्ति जताई – आज की नारी अबला नहीं रही, उसे अबला मत कहिये। वक्ता ने संशोधन किया – ठीक है जी आगे से अबला नहीं कहेंगे बला कहेंगे। :)